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मगध अधिपति जरासंध ---बालेश्वर विद्रोही


पाँचवाँ  सर्ग

पांडव इन्द्रप्रस्थ मे आकर जब-

रहने लगे-हस्तिनापुर त्याग।

वनबास-काल खत्म होते-ही-

आया राजसूय यज्ञ का ख्याल।

 

 

धर्मराज सोचने लगे-तभी-

यज्ञ सफल होगा-यह कैसे ?

क्यों न चलकर कृष्ण से पूछ लें

अनुष्ठान सम्पन्न होगा-कैसे?

 

 

युधिष्ठिर पहुँचे श्रीकृष्ण के समीप-

वह यज्ञ की बात सुना-डाले।

इच्छा, राजसुय यज्ञ करने की-

विधि केशव मुझे बता डालें।

 

सुनकर कृष्ण हुए अति हर्षित-

तभी दिये एक संवाद सुखकर।

कालयवन गया है -मारा-

जो रहा जरासंध का पक्षधर।

 

राजसूय यज्ञ न होगा सफल-

बिना हराये सब राजा को।

मगध पति है पराक्रमी योद्धा-

जीतना होगा जरासंध को।

 

 

 

उसके रहते-यह यज्ञ कदापि-

सफलीभूत नहीं हो सकता।

जीतने का यत्न करें-पहले-

अन्यथा कोरा सपना लगता।

 

 

विनम्र हो बोले-धर्मराज तब-

आशान्वित हूँ मैं-भली-भाँति

पाकर आपका-निर्देश-कुशल-

मुश्किल नहीं जीत की प्राप्ति।

 

 

तब, बात काट कर बोले-कृष्ण-

दिला पायेंगे-जीत , है-भ्रम।

जरासंध ऐसा-विकट योद्धा-

जिसे-हराना मुझे है-विषम।

 

 

रखा है वह असंख्य सेना को

संगठित करके अपने बुर्ज में।

अगर-जीतना होता-सरल तो-

उसे हरा देता-कब रण में।

 

पाया जरासंध अमरता का

ऐसा ही है-अजब वरदान।

चाहे, वीर कैसा भी-रहे-

उसे जीतना नहीं आसान।

 

 

मैं स्वयं भी भयभीत उसी से-

पराजित हुआ-अनेको बार।

नामुमकिन मेरे रहते-भी-

जय पाने का नहीं आसार।

 

 

कृष्ण-कथन सत्य अगर तब-

अब यज्ञ सम्पूर्ण होगा-कैसे?’

सोचकर-धर्मराज हुये-चिंतित।

अनुष्ठान पूर्ण होगा कैसे ?

 

 

फिर भी मुझे है-पूर्ण विश्वास-

कृष्ण के रहते-सभी कुछ संभव।

यह ठहरे ऐसे ही नीतिज्ञ-

जिनके लिये कुछ नहीं असंभव।

 

 

अधीर देख कर धर्मराज को-

कृष्ण कहे –“व्यर्थ हो रहे-आकुल।

धैर्य क्षत्रिय-धर्म है-वीरों का-

ढ़ूँढ़नी पड़ेगी युक्ति माकुल।

 

खत्म हुआ-कालयवन जिस तरह-

वैसी ही युक्ति रचनी होगी।

हराने के लिए-जरासंध को-

कूट-नीति कुछ गढ़नी होगी।

 

 

बिना सहारा लिये प्रपंच का-

होगा नहीं-संहार है-उसका।

जय पाना बाहुबल से-दुष्कर-

मुझे मालूम पराक्रम- उसका।

 

 

धर्मराज कहे- विनम्र भाव से-

न्याय-संगत कार्य नहीं लगता।

युद्ध-नीति के है-प्रतिकूल-

अधार्मिक पहल है दिखता।

 

 

छल से किसी वीर का संहार-

मेरी दृष्टि से लगता-अनुचित।

धर्म-सम्मत भी-इसे नहीं कहते-

और नाहीं है-यह कर्म उचित।

 

 

समझाते हुए बाले केशव-

युद्ध और प्रेम में सब-कुछ क्षम्य।

देखा न जाता उचित-अनुचित-

विजय पाना होता मात्र लक्ष्य।

 

कृष्ण की बात मान वह बोले-

आप ही पांडव के निर्देशक।

जैसा चाहें-वैसा ही-करें-

आप हम सबों के मार्ग-दर्शक।

 

 

 

कृष्ण बोले- रूप बदल कर चलें-

बलकल वस्त्र धारण कर लें सब।

समझेगा-हम सब हैं ब्राह्मण-

जरासंध के राज चल दें अब।

 

 

चंदन-टीका सिर में लगा कर-

गये वे- जरासंध को छलने।

वेष था ब्राह्मण का उनका-

गले में माला सुंदर पहने।

 

 

कृष्ण-अर्जुन और भीम साथ में-

पहुँचे-वे जरासंध के राज।

दिखते चेहरे से ब्राह्मण-

हृदय में छुपाये रहे राज।

 

था मगध राज में ऐसा ही-

सुरक्षा का था पुख्ता इन्तजाम।

प्रवेश-द्वार पर प्रहरी तैनात-

पहुँचना वहाँ था कठिन काम।

 

कृष्ण बोले –“ मुख्य-द्वार को छोड़-

चल दें-पिछले दरवाजे से।

विप्र समझ टोकेगा न कोऊ-

मत-चुकें-उन्हें भरमाने से।

 

 

वे सब राज-दरबार पहुँचे-

विप्र देख जरासंध हुये हर्षित।

सुहाग-भाग आगमन विप्र का-

सोच-उसका मन हुआ प्रमुदित।

 

 

तुरन्त आज्ञा दिये अनुचर को-

लाओ-आसन-जल तत्क्षण।

धर्म है मेरा आदर करना-

पूजित मेरे लिये अतिथिगण।

 

 

परन्तु संशय जग आये मन में-

ब्राह्मण, स्नातक-ब्रह्मचारी।

नहीं आते-माला पहनकर-

सभा-सद-बीच वे रूपधारी।

 

चिन्हित है-इनकी भुजाओं में-

धनुष-वाण और वह प्रत्यंचा।

है अवश्य कोई छद्म-वेषी-

नहीं लगता इनका रूप सच्चा।

 

 

इसमें लगती है चाल नयी-

मुख्य दरवाजा से कैसे आये।

रहस्य गहरा छुपा-सा लगता-

है शंका मन में जाग आये।

 

 

तभी पूछे वह आगन्तुक से

किस प्रयोजन आना-हुआ विप्र?

आये-गुप्त द्वार से किस तरह-

वजह मुझे बताये विप्र-शीघ्र।

 

 

व्यर्थ हो रहे शंकाकुल राजन-

सुना है आप ऐसे-दानी।

वचन के भी उतने ही पक्के-

दर से न जाता कोय खाली।

 

 

ठीक ही सुना है- हे विप्रजन-

है अतिथि सत्कार मेरा कर्त्तव्य।

आप ठहरे अतिथिगण मेरे-

आदर करना   मेरा भवितव्य।

 

 

अन्न-जल ग्रहण करें पहले तो-

फिर, थोड़ा-सा कर लें,  विश्राम।

थके हारे -दूर से- आये-

थकान मिटा लें कर आराम।

 

देंगे जब तक यह वचन नहीं-

माँगूँगा जो मिलेगा-मुझे।

तब तक मैं न जल-पान करूँगा-

या कह दें , यह अस्वीकार मुझे।

 

 

सच-है-दान करना है नित्य काज-

गौ का दान किये आया हूँ।

प्रशन्न होते रहे-विप्रजन पा-

मैं निज धर्म निभा पाया हूँ।

 

 

अगर सत्य आप हैं दानी तब-

झट हामी भर वचन निभायें।

तब अन्न-जल ग्रहण करेंगे हम-

यही सोचकर-हम है आये।

 

जरासंध बोल उठे-तमककर-

मेरे दानी होने पर शक ?

क्षत्रिय मैं, वचन के पक्के-

याचक हैं- माँग लें वेधड़क।

 

शक करने की बात नहीं है-

सचमुच हैं क्षत्रिय- महादानी।

किन्तु, ठीक से सोच लें-पहले-

वचन नहीं जा पाये-खाली।

 

 

अगर वचन से मुकर गये तो-

डूबेगी नेकनामी पावन।

जाकर कहेंगे-राज में हम-

मिथ्या बने दानी मनभावन।

 

 

 

और न हैं वचन के पक्के ही-

नाहीं और महादानी हैं।

झूठा है उद्घोष राज में-

दानी और स्वाभिमानी हैं।

 

 

जरासंध पूछ बैठे-झट से-

कहिये, आपको चाहिये क्या ?

दान में गोधन और ऐश्वर्य-

अलावे, और चाहत है क्या ?

 

 

अगर माँग लें शीश दान में-

तो भी सहर्ष दे डालूँगा।

मगध का राजा क्षत्रिय हूँ मैं-

वचन न खाली जाने दूँगा।

 

 

परन्तु, पुनः मैं हो रहा-सशंकित-

आप नहीं हैं-वह, जो दिखते।

कुछ राज छुपा है-इसमें भी-

छलने वाले छलिया लगते।

 

साफ-साफ बोलें कौन आप?

और, कहाँ के हैं-अधिवासी?

सचमुच हूँ- मैं नहीं ब्राह्मण-

रूप बदलकर आया प्रवासी।

 

 

शीश पर तिलक लगा-रखा मैं-

और वलकल वस्त्र किया-धारण।

सुशोभित गले में है-माला-

सच, इसके पीछे है-कारण।

 

तब जरासंध बोले कड़क कर-

यह तो है सरासर दुःसाहस।

छल से राज सभा में आना-

शीघ्र जायें- राज से वापस।

 

शान्त करते हुये- बोले कृष्ण-

सच है माथे पर तिलक लगा।

वेषधारी बना- मैं विप्र का-

पर, मुझे नहीं यह गलत लगा।

 

 

चाहे ब्राह्मण-या क्षत्रिय-

अधिकारी वेष बदलने का।

ताज्जुब कह रहे-कैसे अनुचित-

हक है इच्छित वस्त्र पहनने का।

 

 

माना-सभी को है अधिकार-

इच्छाकुल वस्त्र पहनने का।

परन्तु कहाँ  का है यह दस्तुर-

है मुख्य-द्वार छोड़ आने का।

 

 

 

आप कौन हैं फिर से बोलें-

प्रयोजन किया है- आगमन का?

देकर तत्क्षण परिचय अपना-

संशय मिटायें- मेरे मन का।

 

उत्तर बिना दिये जरासंध के-

वे उल्टे उससे पूछ बैठे।

 क्या यह सच  नहीं नृप को

बन्दी बनाकर यहाँ है रखे?

 

इस तरह निरापराध नृपों को-

न्यायोचित नहीं दंडित करना।

अशोभनीय कार्य है-नृप का-

अधर्म है बन्दी करके रखना।

 

 युद्ध में हारे हुये- राजा को

बन्दी करना जयी का अधिकार।

यह अपराध नहीं है-कोई-

दंडित किया-राज-धर्म स्वीकार।

 

अंत में कृष्ण खोल पाये रहस्य-

जो अब तक छुपा रखे मन में।

साफ-साफ वह खुलकर बोले-

सुन लें मेरा परिचय क्षण में।

 

 

 

 

 

बाहु-युद्ध करने की मंशा से-

निःशंक भाव से आया हूँ मैं।

विप्र नहीं, वासुदेव नन्दन हूँ-

संग भीम ,पार्थ लाया हूँ मैं।

 

बन्दी नृप को छुड़ा ले जाने-

दृढ़ संकल्प कर आये हैं हम।

उन्हें छुड़ाकर ले जायेंगे-

इसीलिये वेष बदल आये हम।

 

तभी जरासंध बोले- हंसकर-

रख रहे मन में-ख्याल बेकार।

मेरे जीते जी नहीं संभव-

चाहे जोर लगाएं व्यर्थ हजार।

 

सतरह बार-पराजित होकर

पीठ दिखाकर भागते रहे।

वृथा ही बाँध रहे-मन्सूबा-

रण-छोड़ बने, हारते रहे।

 

साहस अगर है तो मगध पर-

आकर ससैन्य आक्रमण करें ।

पुनः देखूँगा-प्रभुता तेरी-

अपनी ही जीत का वरण करें।

 

 

 

 

 

और यह पार्थ जिसे समझते-

बड़ा धन्रुर्धर-गांडिव-धारी।

वह क्या युद्ध करेगा मुझसे ?

स्त्रेण बना- नारी-रूप-धारी।

 

हाँ अलवत्ता- मेरी नजर में-

दिखता एक ही है- महाबली।

टिक पायेगा-बाहु-युद्ध में-

भीम सेन है वह बाहु-बली।

 

मैं तो हो गया हूँ- अभी वृद्ध-

है भीम जवान अति बलवान।

उससे सहर्ष युद्ध करूँगा मैं-

शेष भुजाओं में अभी जान।

 

उपस्थित रहेंगे-दर्शक सारे-

होगा राज में युद्ध-उद्घोष।

बजेगा- रण का बाजा वहाँ-

गुंजायमान होगा-जय घोष।

 

 

आश्चर्य है- इसलिये आपको-

धारण करना पड़ा-छद्म-वेष।

ललाट लगाये चंदन-टीका-

छल से राज में किये-प्रवेश।

 

 

 

 

सच स्वीकारते कहे- कृष्ण-

यह है- सत्य हारता रहा मैं।

उतनी बड़ी सेना के समक्ष-

तुम्हें जीत न सका कभी- मैं।

 

तभी वचनबद्ध किया पहले ही-

तब जा खोल पाया-मैं राज।

प्रतिद्वंद्वी को सामने आकर

चुनौती देना न उचित काज।

 

स्वीकार चुके हैं-स्वयं आप-

बाहु-युद्ध करने को तैयार।

भीम में देव-बल बाहुबल है-

युद्ध के लिए वह रहा ललकार।

 

समां बंध गया था-युद्ध का-

राज में यह हो गया एलान।

आरम्भ होगा मल्ल-युद्ध कल से-

भीम-जरासंध के दरम्यान।

 

जरासंध का अखाड़ा था जो-

गर्वित राजगृह पर्वत पर।

एकत्रित हो गये दर्शक सारे-

रण-भेरी बज उठी-वहाँ पर।

 

 

 

 

 

मल्ल-युद्ध शुरू हो गया-सुबह ही-

जरासंध और भीम के मध्य।

विराम नहीं दिखता तनिक- भी-

चलने लगा- दाँव पर दाँव सध्य।

 

कुश्ती होती रही दोनों में-

कोई न किसी को हरा सका।

सत्ताईस दिनों तक चला युद्ध-

निर्णय न हो पाया-द्वन्द्व-युद्ध का।

 

हुंकार भर-भर कर दोनों थे-

अपने-अपने शौर्य दिखाते।

अपनी-अपनी शक्ति से दोनों-

जोर पर जोर रहे-लगाते।

 

खदेरते कभी जरासंध थे-

पलटवार भीम सेन करते।

बचकर और बचाकर दोनों-

एक दूसरे पर चोट करते।

 

देखकर-मल्ल-युद्ध दर्शक सारे-

हो रहे वहाँ थे भौच्चक।

विराम नहीं दिखता था पलभर-

लग रहा युद्ध बड़ा रोमांचक।

 

 

 

 

 

देते कृष्ण थे-जो भी संकेत-

पर भीम उसे थे भुल जाते।

प्रयत्न उनके विफल होते-ही-

बीम-दाँव-खाली रह जाते।

 

अन्ततोगत्वा कृष्ण सोचने लगे-

मुझे उपाय ढ़ूढ़ना होगा।

भीम को जीत दिलाने हेतु-

प्रपंच कुछ और रचना होगा।

 

अट्ठाईस दिनों तक चला-युद्ध-

कोई न किसी को हरा सका।

अदला - पर अदला थे दोनों-

नहीं जीत सुनिश्चित करा सका।

 

कृष्ण को स्मरण आ गया-पल में-

जरासंध के जन्म मृत्यु की बात।

होगी मृत्यु उसकी वैसे - ही-

जैसा जन्मा, कृष्ण को था ज्ञात।

 

उसे अजर -अमर होने का

अभीष्ट है - शंकर का वरदान।

हरा न सकेगा युद्ध में कोई-

चाहे रहे कितना ही बलवान।

 

 

 

 

 

 

अक्षय जरासंध का बाहु-बल-

कर न सकेगा- उसे पराजित।

चाहे देव , दानव हो, मानव-

जीत न सकेगा- उसे कदाचित।

 

अस्त्र-शस्त्र जैसा भी रहे न-

संहार कभी न होगा - उसका।

किन्तु जरासंध का होगा मरण-

जिस तरह जन्म हुआ उसका।

 

इसके तन के दो भाग अलग-

सर्वदा ही जुटा रहेगा - वह।

वह अलग- अलग होने पर भी-

आकर पुनः जुड़ जायेगा वह।

 

हाँ अगर इसे उलट-पुलट कर-

विपरित दिशा में  फेंका जाय।

जुड़ न सकेगा फिर अंग दोनों-

निःसंदेह मृत्यु उसकी हो जाय।

 

यही सोच कृष्ण ने किया इंगित-

तिनके तोड़ उलट-पुलट फेंक।

भीम संकेत समझ कर झट-से-

जाँघ-चीर कर था दिया-फेंक।

 

 

 

 

मृत्यु हो गयी थी-जरासंध की-

छल से किया गया था संहार।

धर्म की जीत नहीं थी बिल्कुल-

अनीति-पूर्ण यह था-व्यवहार।

 

मरण होते ही जरासंध का-

छा गया-अंधेरा घटा-टोप।

सारा मगध हुआ शोकाकुल-

चन्द्र की आभा का हुआ-लोप।

 

तन का अंत नहीं अंत शौर्य का-

सत्य की हार नहीं होती - जय।

छल-पूर्वक किसी वीर का - हंत-

प्रभुत्व का होता है नहीं क्षय।

 

इतिहास के काले-पृष्टों में-

मिलता कभी अधार्मिक-तत्व।

नव-सृजन का विनम्र प्रयास-

बचाने हेतु वीरों का स्वत्व।