पांडव इन्द्रप्रस्थ मे आकर जब-
रहने लगे-हस्तिनापुर त्याग।
वनबास-काल खत्म होते-ही-
आया राजसूय यज्ञ का ख्याल।
धर्मराज सोचने लगे-तभी-
‘यज्ञ
सफल होगा-यह कैसे ?
क्यों न चलकर कृष्ण से पूछ लें –
अनुष्ठान सम्पन्न होगा-कैसे?
युधिष्ठिर पहुँचे श्रीकृष्ण के
समीप-
वह यज्ञ की बात सुना-डाले।
इच्छा, राजसुय यज्ञ करने की-
विधि केशव मुझे बता डालें।
सुनकर कृष्ण हुए अति हर्षित-
तभी दिये एक संवाद सुखकर।
“कालयवन
गया
है -मारा-
जो रहा जरासंध का पक्षधर।”
राजसूय यज्ञ न होगा सफल-
बिना हराये सब राजा को।
मगध पति है पराक्रमी योद्धा-
जीतना होगा जरासंध को।
उसके रहते-यह यज्ञ कदापि-
सफलीभूत नहीं हो सकता।
जीतने का यत्न करें-पहले-
अन्यथा कोरा सपना लगता।
विनम्र हो बोले-धर्मराज तब-
“आशान्वित
हूँ
मैं-भली-भाँति
पाकर आपका-निर्देश-कुशल-
मुश्किल नहीं जीत की प्राप्ति।”
तब, बात काट कर बोले-कृष्ण-
“दिला
पायेंगे-जीत , है-भ्रम।
जरासंध ऐसा-विकट योद्धा-
जिसे-हराना मुझे है-विषम।
रखा है वह असंख्य सेना को–
संगठित करके अपने बुर्ज में।
अगर-जीतना होता-सरल तो-
उसे हरा देता-कब रण में।
पाया जरासंध अमरता का –
ऐसा ही है-अजब वरदान।
चाहे, वीर कैसा भी-रहे-
उसे जीतना नहीं आसान।
मैं स्वयं भी भयभीत उसी से-
पराजित हुआ-अनेको बार।
नामुमकिन मेरे रहते-भी-
जय पाने का नहीं आसार।”
‘कृष्ण-कथन
सत्य
अगर तब-
अब यज्ञ सम्पूर्ण होगा-कैसे?’
सोचकर-धर्मराज हुये-चिंतित।
‘अनुष्ठान
पूर्ण
होगा कैसे ?
फिर भी मुझे है-पूर्ण विश्वास-
कृष्ण के रहते-सभी कुछ संभव।
यह ठहरे ऐसे ही नीतिज्ञ-
जिनके लिये कुछ नहीं असंभव।’
अधीर देख कर धर्मराज को-
कृष्ण कहे –“व्यर्थ
हो
रहे-आकुल।
धैर्य क्षत्रिय-धर्म है-वीरों का-
ढ़ूँढ़नी पड़ेगी युक्ति माकुल।
खत्म हुआ-कालयवन जिस तरह-
वैसी ही युक्ति रचनी होगी।
हराने के लिए-जरासंध को-
कूट-नीति कुछ गढ़नी होगी।
बिना सहारा लिये प्रपंच का-
होगा नहीं-संहार है-उसका।
जय पाना –बाहुबल
से-दुष्कर-
मुझे मालूम पराक्रम- उसका।”
धर्मराज कहे- विनम्र भाव से-
‘न्याय-संगत
कार्य
नहीं लगता।
युद्ध-नीति के है-प्रतिकूल-
अधार्मिक पहल है –दिखता।
छल से किसी वीर का संहार-
मेरी दृष्टि से लगता-अनुचित।
धर्म-सम्मत भी-इसे नहीं कहते-
और नाहीं है-यह कर्म उचित।’
समझाते हुए बाले केशव-
“युद्ध
और
प्रेम में सब-कुछ क्षम्य।
देखा न जाता –उचित-अनुचित-
विजय पाना होता मात्र लक्ष्य।”
कृष्ण की बात मान वह बोले-
“आप
ही पांडव के निर्देशक।
जैसा चाहें-वैसा ही-करें-
आप हम सबों के मार्ग-दर्शक।”
कृष्ण बोले-“ रूप
बदल कर चलें-
बलकल वस्त्र धारण कर लें सब।
समझेगा-हम सब हैं ब्राह्मण-
जरासंध के राज चल दें अब। ”
चंदन-टीका सिर में लगा कर-
गये वे- जरासंध को छलने।
वेष था ब्राह्मण का उनका-
गले में माला सुंदर पहने।
कृष्ण-अर्जुन और भीम साथ में-
पहुँचे-वे जरासंध के राज।
दिखते चेहरे से ब्राह्मण-
हृदय में छुपाये रहे राज।
था मगध राज में ऐसा –ही-
सुरक्षा का था पुख्ता इन्तजाम।
प्रवेश-द्वार पर प्रहरी तैनात-
पहुँचना वहाँ था कठिन काम।
कृष्ण बोले –“
मुख्य-द्वार को छोड़-
चल दें-पिछले दरवाजे से।
विप्र समझ टोकेगा न कोऊ-
मत-चुकें-उन्हें भरमाने से।”
वे सब राज-दरबार पहुँचे-
विप्र देख जरासंध हुये हर्षित।
सुहाग-भाग आगमन विप्र का-
सोच-उसका मन हुआ प्रमुदित।
तुरन्त आज्ञा दिये अनुचर को-
“लाओ-आसन-जल
तत्क्षण।
धर्म है मेरा आदर करना-
पूजित मेरे लिये अतिथिगण।”
परन्तु संशय जग आये मन में-
“ब्राह्मण,
स्नातक-ब्रह्मचारी।
नहीं आते-माला पहनकर-
सभा-सद-बीच वे रूपधारी।
चिन्हित है-इनकी भुजाओं में-
धनुष-वाण और वह प्रत्यंचा।
है अवश्य कोई छद्म-वेषी-
नहीं लगता इनका रूप सच्चा।
इसमें लगती है चाल नयी-
मुख्य दरवाजा से कैसे आये।
रहस्य गहरा छुपा-सा लगता-
है शंका मन में जाग आये।”
“तभी
पूछे वह आगन्तुक से –
किस प्रयोजन आना-हुआ
विप्र?
आये-गुप्त द्वार से किस तरह-
वजह मुझे बताये विप्र-शीघ्र।
व्यर्थ हो रहे शंकाकुल राजन-
सुना है आप ऐसे-दानी।
वचन के भी उतने ही पक्के-
दर से न जाता कोय खाली।”
“ठीक
ही सुना है- हे विप्रजन-
है अतिथि सत्कार मेरा कर्त्तव्य।
आप ठहरे अतिथिगण मेरे-
आदर करना –
मेरा भवितव्य।
अन्न-जल ग्रहण करें पहले तो-
फिर, थोड़ा-सा कर लें, विश्राम।
थके हारे -दूर से- आये-
थकान मिटा लें कर आराम।”
“देंगे
जब
तक यह वचन नहीं-
माँगूँगा जो मिलेगा-मुझे।
तब तक मैं न जल-पान करूँगा-
या कह दें , यह अस्वीकार मुझे।”
“सच-है-दान
करना
है नित्य काज-
गौ का दान किये आया हूँ।
प्रशन्न होते रहे-विप्रजन पा-
मैं निज धर्म निभा पाया हूँ।”
“अगर
सत्य आप हैं दानी तब-
झट हामी भर वचन निभायें।
तब अन्न-जल ग्रहण करेंगे हम-
यही सोचकर-हम है –आये।”
जरासंध बोल उठे-तमककर-
“मेरे
दानी होने पर शक ?
क्षत्रिय मैं, वचन के पक्के-
याचक हैं- माँग लें वेधड़क।”
“शक
करने की बात नहीं है-
सचमुच हैं –क्षत्रिय-
महादानी।
किन्तु, ठीक से सोच लें-पहले-
वचन नहीं जा पाये-खाली।
अगर वचन से मुकर गये तो-
डूबेगी नेकनामी पावन।
जाकर कहेंगे-राज में हम-
मिथ्या बने दानी मनभावन।
और न हैं –वचन
के पक्के ही-
नाहीं और महादानी हैं।
झूठा है उद्घोष राज में-
दानी और स्वाभिमानी हैं।”
जरासंध पूछ बैठे-झट से-
“कहिये,
आपको
चाहिये क्या ?
दान में गोधन और ऐश्वर्य-
अलावे, और चाहत है क्या ?
अगर माँग लें –शीश
दान में-
तो भी सहर्ष दे डालूँगा।
मगध का राजा क्षत्रिय हूँ मैं-
वचन न खाली जाने दूँगा।
परन्तु, पुनः मैं हो रहा-सशंकित-
आप नहीं हैं-वह, जो दिखते।
कुछ राज छुपा है-इसमें भी-
छलने वाले छलिया लगते।
साफ-साफ बोलें कौन आप?
और, कहाँ के हैं-अधिवासी? ”
“सचमुच
हूँ-
मैं नहीं ब्राह्मण-
रूप बदलकर –आया
प्रवासी।
शीश पर तिलक लगा-रखा मैं-
और वलकल वस्त्र किया-धारण।
सुशोभित गले में है-माला-
सच, इसके पीछे है-कारण।”
तब जरासंध बोले कड़क कर-
“यह
तो है सरासर दुःसाहस।
छल से राज सभा में आना-
शीघ्र जायें- राज से वापस।”
शान्त करते हुये- बोले कृष्ण-
“सच
है माथे पर तिलक लगा।
वेषधारी बना- मैं विप्र का-
पर, मुझे नहीं यह गलत लगा।
चाहे ब्राह्मण-या क्षत्रिय-
अधिकारी वेष बदलने का।
ताज्जुब कह रहे-कैसे अनुचित-
हक है –इच्छित वस्त्र पहनने का।”
“माना-सभी
को
है –अधिकार-
इच्छाकुल वस्त्र पहनने का।
परन्तु कहाँ
का है यह दस्तुर-
है मुख्य-द्वार छोड़ आने का।
आप कौन हैं फिर से बोलें-
प्रयोजन किया है- आगमन का?
देकर तत्क्षण परिचय अपना-
संशय मिटायें- मेरे मन का।”
उत्तर बिना दिये जरासंध के-
वे उल्टे उससे पूछ बैठे।
“क्या
यह सच नहीं नृप को –
बन्दी बनाकर यहाँ है रखे?
इस तरह निरापराध नृपों को-
न्यायोचित नहीं दंडित करना।
अशोभनीय कार्य है-नृप का-
अधर्म है बन्दी करके रखना।”
“युद्ध
में हारे हुये- राजा को –
बन्दी करना जयी का अधिकार।
यह अपराध नहीं है-कोई-
दंडित किया-राज-धर्म स्वीकार।”
अंत में कृष्ण खोल पाये रहस्य-
जो अब तक छुपा रखे मन में।
साफ-साफ वह खुलकर बोले-
“सुन
लें –मेरा परिचय क्षण में।
बाहु-युद्ध करने की मंशा से-
निःशंक भाव से आया हूँ मैं।
विप्र नहीं, वासुदेव नन्दन हूँ-
संग भीम ,पार्थ लाया हूँ मैं।
बन्दी नृप को छुड़ा ले जाने-
दृढ़ संकल्प कर आये हैं हम।
उन्हें छुड़ाकर ले जायेंगे-
इसीलिये वेष बदल आये हम।”
तभी जरासंध बोले- हंसकर-
“ रख
रहे मन में-ख्याल बेकार।
मेरे जीते जी नहीं संभव-
चाहे जोर लगाएं व्यर्थ हजार।
सतरह बार-पराजित होकर –
पीठ दिखाकर भागते रहे।
वृथा ही बाँध रहे-मन्सूबा-
रण-छोड़ बने, हारते रहे।
साहस अगर है तो मगध पर-
आकर ससैन्य आक्रमण करें ।
पुनः देखूँगा-प्रभुता तेरी-
अपनी ही जीत का वरण करें।
और यह पार्थ –जिसे
समझते-
बड़ा धन्रुर्धर-गांडिव-धारी।
वह क्या युद्ध करेगा मुझसे ?
स्त्रेण बना- नारी-रूप-धारी।
हाँ अलवत्ता- मेरी नजर में-
दिखता एक ही है- महाबली।
टिक पायेगा-बाहु-युद्ध में-
भीम सेन है वह बाहु-बली।
मैं तो हो गया हूँ- अभी वृद्ध-
है भीम जवान अति बलवान।
उससे सहर्ष युद्ध करूँगा मैं-
शेष भुजाओं में अभी जान।
उपस्थित रहेंगे-दर्शक सारे-
होगा राज में युद्ध-उद्घोष।
बजेगा- रण का बाजा वहाँ-
गुंजायमान होगा-जय घोष।
आश्चर्य है- इसलिये आपको-
धारण करना पड़ा-छद्म-वेष।
ललाट लगाये –चंदन-टीका-
छल से राज में किये-प्रवेश।”
सच स्वीकारते कहे- कृष्ण-
“यह
है- सत्य –हारता रहा मैं।
उतनी बड़ी सेना के समक्ष-
तुम्हें जीत न सका –कभी-
मैं।
तभी वचनबद्ध किया पहले ही-
तब जा खोल पाया-मैं राज।
प्रतिद्वंद्वी को सामने आकर –
चुनौती देना न उचित काज।
स्वीकार चुके हैं-स्वयं आप-
बाहु-युद्ध करने को तैयार।
भीम में देव-बल बाहुबल है-
युद्ध के लिए वह रहा ललकार।”
समां बंध गया था-युद्ध का-
राज में यह हो गया एलान।
आरम्भ होगा मल्ल-युद्ध कल से-
भीम-जरासंध के दरम्यान।
‘जरासंध
का
अखाड़ा’ था जो-
गर्वित राजगृह पर्वत पर।
एकत्रित हो गये –दर्शक
सारे-
रण-भेरी बज उठी-वहाँ पर।
मल्ल-युद्ध शुरू हो गया-सुबह ही-
जरासंध और भीम के मध्य।
विराम नहीं दिखता तनिक- भी-
चलने लगा- दाँव पर दाँव सध्य।
कुश्ती होती रही –दोनों
में-
कोई न किसी को हरा सका।
सत्ताईस दिनों तक चला युद्ध-
निर्णय न हो पाया-द्वन्द्व-युद्ध
का।
हुंकार भर-भर कर दोनों थे-
अपने-अपने शौर्य दिखाते।
अपनी-अपनी शक्ति से दोनों-
जोर पर जोर रहे-लगाते।
खदेरते कभी जरासंध थे-
पलटवार भीम सेन करते।
बचकर और बचाकर दोनों-
एक दूसरे पर चोट करते।
देखकर-मल्ल-युद्ध दर्शक सारे-
हो रहे वहाँ थे भौच्चक।
विराम नहीं दिखता था –पलभर-
लग रहा युद्ध बड़ा रोमांचक।
देते कृष्ण थे-जो भी संकेत-
पर भीम उसे थे भुल जाते।
प्रयत्न उनके विफल होते-ही-
बीम-दाँव-खाली रह जाते।
अन्ततोगत्वा कृष्ण सोचने लगे-
“मुझे
उपाय ढ़ूढ़ना – होगा।
भीम को जीत दिलाने हेतु-
प्रपंच कुछ और रचना होगा।”
अट्ठाईस दिनों तक चला-युद्ध-
कोई न किसी को हरा सका।
अदला - पर अदला थे दोनों-
नहीं जीत सुनिश्चित करा सका।
कृष्ण को स्मरण आ गया-पल में-
जरासंध के जन्म मृत्यु की बात।
होगी मृत्यु उसकी वैसे - ही-
जैसा जन्मा, कृष्ण को था ज्ञात।
उसे अजर -अमर होने का –
अभीष्ट है - शंकर का वरदान।
हरा न सकेगा – युद्ध में कोई-
चाहे रहे –
कितना ही बलवान।
‘अक्षय’
जरासंध का बाहु-बल-
कर न सकेगा- उसे पराजित।
चाहे देव , दानव हो, मानव-
जीत न सकेगा- उसे कदाचित।
अस्त्र-शस्त्र जैसा भी रहे न-
संहार कभी न होगा - उसका।
किन्तु जरासंध का होगा मरण-
जिस तरह जन्म हुआ उसका।
इसके तन के दो भाग अलग-
सर्वदा ही जुटा रहेगा - वह।
वह अलग- अलग होने पर भी-
आकर पुनः जुड़ जायेगा वह।
हाँ अगर इसे उलट-पुलट कर-
विपरित दिशा में
फेंका जाय।
जुड़ न सकेगा –फिर
अंग दोनों-
निःसंदेह मृत्यु उसकी हो जाय।
यही सोच –
कृष्ण ने किया इंगित-
तिनके तोड़ उलट-पुलट फेंक।
भीम संकेत समझ कर झट-से-
जाँघ-चीर कर था दिया-फेंक।
मृत्यु हो गयी थी-जरासंध की-
छल से किया गया था संहार।
धर्म की जीत नहीं थी –बिल्कुल-
अनीति-पूर्ण यह था-व्यवहार।
मरण होते ही –
जरासंध का-
छा गया-अंधेरा घटा-टोप।
सारा मगध हुआ –
शोकाकुल-
चन्द्र की आभा का हुआ-लोप।
तन का अंत –
नहीं अंत शौर्य का-
सत्य की हार नहीं होती - जय।
छल-पूर्वक किसी वीर का - हंत-
प्रभुत्व का होता है नहीं क्षय।
इतिहास के काले-पृष्टों में-
मिलता कभी अधार्मिक-तत्व।
नव-सृजन का विनम्र प्रयास-
बचाने हेतु वीरों का स्वत्व।