पन्द्रह साल की अवस्था में ही –
वृहद्रथ बेटा को सौंप राज ।
निकल पड़े –तप
करने वन को-
चलाने लगा वह राज-काज।
करने लगा था –राज-पाट-
राज-विस्तार का रख कर ध्यान।
लगा बढ़ाने सेना को वह –
हुआ जरासंध शासक महान।
कंस था जमाई –जरासंध
का-
पराक्रमी राजा मथुरा का ।
कृष्ण ने किया-संहार उसे जब-
क्रोधाग्नि भड़क उठा उसका।
सह न सका-दारूण-संताप वह-
रक्तिम –ज्वार
उमड़ा
था मन में।
संगठित किया-सैन्य-बल उसने-
लिया संकल्प वह युद्ध का मन में।
नस-नस में खौलता रहा रक्त गर्म-
जागा मन में प्रतिशोध-भाव।
प्रतिद्वन्द्वी बना कृष्ण का वह-
बढ़ा उसका मानसिक तनाव।
तभी कालयवन पहुँचा-वहाँ-
जरासंध को देने-सहयोग।
वह रहा-अत्यंत ही बलशाली-
यह था गजब का संयोग।
तभी पहुँचा-था –शिशुपाल
भी-
मित्रता का अपना धर्म निभाने।
कृष्ण से बैर -भाव था -मन में –
आया था वह उसे -दिखाने।
उन दोनों को देख जरासंध-
हर्षित हुआ-था-बढ़ा मनोबल।
बोला –कालयवन से था -वह-
“युद्ध
करो-कृष्ण
से, दिखा निज-बल।”
शिशुपाल था –कृष्ण
के
रिश्ते में –
बुआ की वह अपनी संतान।
उसका मरण कृष्ण के हाथों है-
इससे थी वह नहीं अनजान ।
प्राणदान माँगने हेतु –वह-
पहुँच गई तुरन्त, कृष्ण के पास।
कहने लगी-विनित भाव से –
“मारकर
उसे
–मत कर हतास।
बने रहे-अनजान, कहे कृष्ण-
“क्यों
हो
रही-इस तरह अधीर ?
बतलाओ –साफ- साफ मुझको –
कह डालो -निज हृदय- गत पीर ।”
“क्या
यह सच नहीं-मृत्यु लिखी है-
मेरे पुत्र की तुम्हारे हाथ ?
उसे अभयदान दे-सत्य अगर –
मुकर कर मत कर , मुझे निराश।”
दार्शनिक भाव से बोले-कृष्ण-
“मृत्यु
तो
है अवश्य-संभावी।
अगर मृत्यु लिखी-मेरे हाथों –
तो है-यह सत्य प्रबल-भावी।
फिर भी, मैं देता हूँ-तुम्हें
वचन-
निनानवे भूल माफ करूँगा।
सौवीं गलती-जिस क्षण होगी-
वहाँ चक्र सुदर्शन चला दूँगा।”
शिशुपाल रहस्य जान न पाया-
करता रहा –कृष्ण
का
प्रतिकार।
उनको श्रेष्ठ –मानने
से–वह-
सदा करता रहा वह इन्कार।
शिशुपाल अपने कटु वचनों से-
कृष्ण पर करता रहता आघात।
खरी-खोटी सुनाकर -उसने –
अनवरत किया- घात पर घात।
गलतियाँ होती रही –उससे-
गिनते रहे –कृष्ण
मन-ही मन।
करते रहा -भूल पर भूल जब-
निकट लाया वह मरण का क्षण।
विद्वेष-भाव ही रहा –
परस्पर-
कृष्ण का प्रतिद्वन्द्वी बन पाया।
इसी उद्देश्य से संग-जरासंध-
मित्रता करने को था -आया।
कलयवन कहा - जरासंध से-
“कहें
मुझे-कृष्ण से युद्ध करने।
मित्रता का धर्म निभाने हेतु-
पक्ष-धर बन आया हूँ –लड़ने।”
सुनकर- जरासंध हुए अति प्रसन्न-
कालयवन से बोला- वह तब।
“जाओ
कृष्ण पर-करो आक्रमण-
अपनी जीत सुनिश्चत करो –अब।
पर, सावधान रहना होगा-
कृष्ण है- बड़ा ही –चतुर-प्रपंची।
पारंगत है वह छल-विद्या में-
बना है मेरा विकट प्रतिद्वन्द्वी।”
कूच कर गया था-कालयवन-
हृदय में अदम्य साहस भर कर।
दोनों के बीच छिड़ गया-युद्ध-
भाग चले-कृष्ण मुँह की खाकर।
वह पीछा करते रहा -उन्हें –
लुक-छिप भाग रहे थे कृष्ण।
पर कालयवन था रूक न सका-
एक गुफा में जा-छुप गये कृष्ण।
गुफा में सो रहा था –मुचकुंद-
जिसे अभिष्ट था-ऐसा वरदान।
‘क्रुद्ध
हो
ताकेगा-जिसको वह-
क्षण में हो जायेगा-लयमान।’
मुचकुंद था –अति
बलशाली-
लड़ा था-जो देवा-सुर संग्राम।
जीत दिलायी थी –देवों
को-
असुरों का किया-काम तमाम।
इन्द्रदेव दिये- वरदान उसे –
‘जिसे
क्रोध से ताकोगे तू।
भष्म हो जायेगा पल में वह-
सर्वजयी कहलाओगे तू।’
युद्ध समाप्त होते ही मुचकुंद-
आने को पृथ्वी पर की चाह।
बहुत तक वह रहा-स्वर्ग में –
भूल गया था-घर की राह।
विनित भाव से कहा इन्द्र से –
“चाहत
है मेरी-घर जाने की।
इतने दिनों तक रहा-स्वर्ग में-
याद आ गई है मुझे घर की।”
इस पर इन्द्र बोले -मुचकुंद से –
“वृथा
है घर जाने का ख्याल।
जानते नहीं स्वर्ग का एक पल ,
महि का होता है कल्प समान।
इतने दिनों तक वहाँ न कोई,
बचा रहेगा- यह
सच मानो-
जाना ही है तो तुम जाओ-
बात हमारी मिथ्या न जानो।”
स्वर्ग से लौटा मुचकुन्द जबसे-
देखा-खत्म-सभी सकल समाज।
नाम-निशान मिट गया-घर का-
बचा नहीं था-कोय पहचान।
मुचकुन्द दुःखी –गुफा
में आकर-
सो गया था-चादर तान ।
थका सिंह-सा था- वह श्रांत-
लग गया हो जैसे शक्ति-वाण।
महाभारत के काल-खंड में –
छल का ही रहा –समग्र
सम्राज्य।
प्रपंच का था –ही
बोल-बाला-
कृष्ण का रहा –संबंध
तादात्मय।
कालयवन पर जय पाने की –
थी कृष्ण के मन में, युक्ति पाली।
उसे अंत करने की-योजना-
तुरन्त, वह मन में बना डाली।
कृष्ण प्रवेश करते गुफा में-
थी बदल दी मुचकुन्द की चादर।
अपनी पिताम्बरी दी ओढ़ा-
स्वयं रख ली थी –
उसकी चादर।
ढ़ूढ़ते आया-जब कालयवन-
समझा-कृष्ण ही छुप कर सोये।
ललकार कर कहा “उठ
कायर
क्यों भाग कर यहाँ है आये?
दम है तो मुझसे करो-युद्ध –
अगर शेष जरा भी पुरूषार्थ।
धिक्कार तुम्हे है – हे
रण-छोड़-
मुझसे लड़, दिखा-सामर्थ्य। ”
तभी जगा –क्रुद्ध
होकर
मुचकुंद-
ताकते –कालयवन हुआ भस्म।
आनन्दित हो उठे थे कृष्ण सोच-
‘काल-कंस
अब
हो गया है-खत्म’।
जब देर तक वह नहीं लौटा-
जरासंध हो उठे –तभी
चिंतित।
वह अवगत था कृष्ण के छल से-
पल भर सोच वह हुये-सशंकित।
दुखद-संवाद मिला इतने में-
कालयवन का हुआ-प्राणांत।
क्रोध जगा-सुन उसके मन में –
सहन न कर सका शोक-संवाद।
तेरह अक्षौहिणी सेना को-
ले मथुरा पर आक्रमण किया।
छिड़ गया-युद्ध–जरासंध
कृष्ण
में-
जरासंध मनोबल शमन किया।
पराक्रम देख कृष्ण हुए हतप्रभ-
हुए-जरासंध से वह पराजित।
अनेका-नेक बार होता रहा-युद्ध-
हर बार कृष्ण रहे अविजित।
सतरह बार कृष्ण-जरासंध से –
युद्ध में थे , वह मुँह की खाये।
इस तरह युद्ध में हार कर वह-
मथुरा से द्वारिका भाग आये।
मानव चाहे हो कितना-ही-
शौर्यवान और बलशाली।
समय के आगे न चलता जोर-
कैसा ही हो – वह
शक्तिशाली।
*