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मगध अधिपति जरासंध ---बालेश्वर विद्रोही


 चौथा सर्ग


पन्द्रह साल की अवस्था में ही

वृहद्रथ बेटा को सौंप राज ।

निकल पड़े तप करने वन को-

चलाने लगा वह राज-काज।

 

 

करने लगा था राज-पाट-

राज-विस्तार का रख कर ध्यान।

लगा बढ़ाने सेना को वह

हुआ जरासंध शासक महान।

 

 

कंस था जमाई जरासंध का-

पराक्रमी राजा मथुरा का ।

कृष्ण ने किया-संहार उसे जब-

क्रोधाग्नि भड़क उठा उसका।

 

 

सह न सका-दारूण-संताप वह-

रक्तिम ज्वार उमड़ा था मन में।

संगठित किया-सैन्य-बल उसने-

लिया संकल्प वह युद्ध का मन में।

 

नस-नस में खौलता रहा रक्त गर्म-

जागा मन में प्रतिशोध-भाव।

प्रतिद्वन्द्वी बना कृष्ण का वह-

बढ़ा उसका मानसिक तनाव।

 

 

तभी कालयवन पहुँचा-वहाँ-

जरासंध को देने-सहयोग।

वह रहा-अत्यंत ही बलशाली-

यह था गजब का संयोग।

 

 

तभी पहुँचा-था शिशुपाल भी-

मित्रता का अपना धर्म निभाने।

कृष्ण से बैर -भाव था -मन में

आया था वह उसे -दिखाने।

 

उन दोनों को देख जरासंध-

हर्षित हुआ-था-बढ़ा मनोबल।

बोला कालयवन से था -वह-

युद्ध करो-कृष्ण से, दिखा निज-बल।

 

 

शिशुपाल था कृष्ण के रिश्ते में

बुआ की वह अपनी संतान।

उसका मरण कृष्ण के हाथों है-

इससे थी वह नहीं अनजान ।

 

 

प्राणदान माँगने हेतु वह-

पहुँच गई तुरन्त, कृष्ण के पास।

कहने लगी-विनित भाव से

मारकर उसे मत कर हतास।

 

 

 

बने रहे-अनजान, कहे कृष्ण-

क्यों हो रही-इस तरह अधीर ?

बतलाओ साफ- साफ मुझको

कह डालो -निज हृदय- गत पीर ।

 

 

क्या यह सच नहीं-मृत्यु लिखी है-

मेरे पुत्र की तुम्हारे हाथ ?

उसे अभयदान दे-सत्य अगर

मुकर कर मत कर , मुझे निराश।

 

दार्शनिक भाव से बोले-कृष्ण-

मृत्यु तो है अवश्य-संभावी।

अगर मृत्यु लिखी-मेरे हाथों

तो है-यह सत्य प्रबल-भावी।

 

फिर भी, मैं देता हूँ-तुम्हें वचन-

निनानवे भूल माफ करूँगा।

सौवीं गलती-जिस क्षण होगी-

वहाँ चक्र सुदर्शन चला दूँगा।

 

 

शिशुपाल रहस्य जान न पाया-

करता रहा कृष्ण का प्रतिकार।

उनको श्रेष्ठ मानने सेवह-

सदा करता रहा वह इन्कार।

 

 

शिशुपाल अपने कटु वचनों से-

कृष्ण पर करता रहता आघात।

खरी-खोटी सुनाकर -उसने

अनवरत किया- घात पर घात।

 

गलतियाँ होती रही उससे-

गिनते रहे कृष्ण मन-ही मन।

करते रहा -भूल पर भूल जब-

निकट लाया वह मरण का क्षण।

 

विद्वेष-भाव ही रहा परस्पर-

कृष्ण का प्रतिद्वन्द्वी बन पाया।

इसी उद्देश्य से संग-जरासंध-

मित्रता करने को था -आया।

 

कलयवन कहा - जरासंध से-

कहें मुझे-कृष्ण से युद्ध करने।

मित्रता का धर्म निभाने हेतु-

पक्ष-धर बन आया हूँ लड़ने।

 

सुनकर- जरासंध हुए अति प्रसन्न-

कालयवन से बोला- वह तब।

जाओ कृष्ण पर-करो आक्रमण-

अपनी जीत सुनिश्चत करो अब।

 

 

 

 

 

 

पर, सावधान रहना होगा-

कृष्ण है- बड़ा ही चतुर-प्रपंची।

पारंगत है वह छल-विद्या में-

बना है मेरा विकट प्रतिद्वन्द्वी।

 

 

कूच कर गया था-कालयवन-

हृदय में अदम्य साहस भर कर।

दोनों के बीच छिड़ गया-युद्ध-

भाग चले-कृष्ण मुँह की खाकर।

 

 

वह पीछा करते रहा -उन्हें

लुक-छिप भाग रहे थे कृष्ण।

पर कालयवन था रूक न सका-

एक गुफा में जा-छुप गये कृष्ण।

 

गुफा में सो रहा था मुचकुंद-

जिसे अभिष्ट था-ऐसा वरदान।

क्रुद्ध हो ताकेगा-जिसको वह-

क्षण में हो जायेगा-लयमान।

 

मुचकुंद था अति बलशाली-

लड़ा था-जो देवा-सुर संग्राम।

जीत दिलायी थी देवों को-

असुरों का किया-काम तमाम।

 

 

 

इन्द्रदेव दिये- वरदान उसे

जिसे क्रोध से ताकोगे तू।

भष्म हो जायेगा पल में वह-

सर्वजयी कहलाओगे तू।

 

युद्ध समाप्त होते ही मुचकुंद-

आने को पृथ्वी पर की चाह।

बहुत तक वह रहा-स्वर्ग में

भूल गया था-घर की राह।

 

विनित भाव से कहा इन्द्र से

चाहत है मेरी-घर जाने की।

इतने दिनों तक रहा-स्वर्ग में-

याद आ गई है मुझे घर की।

 

इस पर इन्द्र बोले -मुचकुंद से

वृथा है घर जाने का ख्याल।

जानते नहीं स्वर्ग का एक पल ,

महि का होता है कल्प समान।

 

 

इतने दिनों तक वहाँ न कोई,

बचा रहेगा- यह  सच मानो-

जाना ही है तो तुम जाओ-

बात हमारी मिथ्या न जानो।

 

 

 

स्वर्ग से लौटा मुचकुन्द जबसे-

देखा-खत्म-सभी सकल समाज।

नाम-निशान मिट गया-घर का-

बचा नहीं था-कोय पहचान।

 

 

मुचकुन्द दुःखी गुफा में आकर-

सो गया था-चादर तान ।

थका सिंह-सा था- वह श्रांत-

लग गया हो जैसे शक्ति-वाण।

 

 

महाभारत के काल-खंड में

छल का ही रहा समग्र सम्राज्य।

प्रपंच का था ही बोल-बाला-

कृष्ण का रहा संबंध तादात्मय।

 

 

कालयवन पर जय पाने की 

थी कृष्ण के मन में, युक्ति पाली।

उसे अंत करने की-योजना-

तुरन्त, वह मन में बना डाली।

 

कृष्ण प्रवेश करते गुफा में-

थी बदल दी मुचकुन्द की चादर।

अपनी पिताम्बरी दी ओढ़ा-

स्वयं रख ली थी उसकी चादर।

 

 

ढ़ूढ़ते आया-जब कालयवन-

समझा-कृष्ण ही छुप कर सोये।

ललकार कर कहा उठ कायर

क्यों भाग कर यहाँ है आये?

 

 

दम है तो मुझसे करो-युद्ध

अगर शेष जरा भी पुरूषार्थ।

धिक्कार तुम्हे है हे रण-छोड़-

मुझसे लड़, दिखा-सामर्थ्य।

 

 

तभी जगा क्रुद्ध होकर मुचकुंद-

ताकते कालयवन हुआ भस्म।

आनन्दित हो उठे थे कृष्ण सोच-

काल-कंस अब हो गया है-खत्म

 

 

जब देर तक वह नहीं लौटा-

जरासंध हो उठे तभी चिंतित।

वह अवगत था कृष्ण के छल से-

पल भर सोच वह हुये-सशंकित।

 

दुखद-संवाद मिला इतने में-

कालयवन का हुआ-प्राणांत।

क्रोध जगा-सुन उसके मन में

सहन न कर सका शोक-संवाद।

 

 

तेरह अक्षौहिणी सेना को-

ले मथुरा पर आक्रमण किया।

छिड़ गया-युद्धजरासंध कृष्ण में-

जरासंध मनोबल शमन किया।

 

 

पराक्रम देख कृष्ण हुए हतप्रभ-

हुए-जरासंध से वह पराजित।

अनेका-नेक बार होता रहा-युद्ध-

हर बार कृष्ण रहे अविजित।

 

 

सतरह बार कृष्ण-जरासंध से

युद्ध में थे , वह मुँह की खाये।

इस तरह युद्ध में हार कर वह-

मथुरा से द्वारिका भाग आये।

 

 

मानव चाहे हो कितना-ही-

शौर्यवान और बलशाली।

समय के आगे न चलता जोर-

कैसा ही हो वह शक्तिशाली।

 

 

 

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