वृहद्रथ थे –पिता
जरासंध के –
मगध के वे प्रतापी-शासक।
बड़े ही कुशल राज-कार्य में-
ज्ञान था –धर्मशास्त्र
का
व्यापक।
काशी-नरेश की कन्या द्वैय-
विवाही गई-थी वृहद्रथ से।
दामपत्य-जीवन सुख से –पूरित-
संतुष्ट थे –उनके
सद्भाव से।
दोनों हेतु समान खुशी के-
वृहद्रथ सदा रहे-अभिलाषी।
टूटने नहीं दिये-मनुहार
बने रहे उनके अनुरागी।
पर, दुर्भाग्य मानव-जीवन में-
हैं आते-जाते ही रहते।
कभी-पतझड़ तो कभी वसंत भी-
हैं प्रकृति-गोद खेला करते।
मिलन-विछुड़न सुख-दुःख के यहाँ-
आँख-मिचौनी चलती रहती।
कभी हँसी तो कभी रूदन है-
काल की पहिया घुमा करती।
वृहद्रथ के जीवन में ऐसा-
दुखद एक समय था आया।
निःसंतान रहे वे अबतक थे-
दारूण दुःख था उन्हें सताया।
सहते-सहते असहनीय दुःख-
मन विकल हो उठा था –उनका।
वात्सल्य-सुखों से रिक्त हृदय अब-
दग्ध हो रहा था कबसे उनका।
वैराग्य-भाव उपजे मन में-
अरूचि हो गई –राज-पाट
से।
मंत्री को सौंप-राज-कार्य को-
विमुक्त हुए- वहाँ काम-काज से।
माया-मोह त्यागकर वह थे-
निकल पड़े-तप करने घर से।
रहे-भटकते-शाँति ढ़ूँढ़ते-
जंगल पहुँचे उद्भ्रांत चित्त से।
चंड कौशिक मुनि से –हुई
भेंट-
तपस्या में जो थे वहाँ-निमग्न।
जा गिर पड़े-चरण में मुनि के –
हो गया था उनका ध्यान भग्न।
मुनि श्रेष्ठ पूछ बैठे-तत्क्षण-
“कौन
हो तू-दुःखी क्योंकर ?
दूर करो मन की-विह्वलता-
तू माँग लो –इच्छित
वर।”
“मैं
हूँ राजा मगध राज के-
वृहद्रथ एक ऐसा ही-अभाग्य।
संतान-हीन रहा हूँ-अब तक-
है कैसा यह मेरा दुर्भाग्य।
मन उचट गया राज-पाट से-
जिसे छोड़
आया मैं
वन में।
अरूचि हो गई-राज-सुखों से-
विरक्ति के भाव जागे मन में।”
द्रवित हुये-उनकी दशा देख-
कहे मुनि-“ले
यह आम्रफल।
जा इसे –खिला
दे रानी को-
कामना तेरी होगी -सफल।
पुत्र होगा-ऐसा बलशाली-
जोड़ न होगा कोई उसका।
नाम करेगा-रौशन तेरा-
यश-गान सर्वत्र होगा उसका।
उसे हरा न सकेगा कोई-
चाहे हो कितना क्यों न वीर?
निष्कंटक राज करेगा-महि पर-
होगा वह विकट रण-धीर।
निपुण होगा वह युद्ध-कला में-
रहेगा-दया-धर्म अनुपालक।
मानवीयता से ओत-प्रोत-
निर्बलों का बनेगा सहायक।”
मुनिवर प्रदत्त आम्र-फल लेकर –
खुशी-खुशी लौटे राजमहल।
खिला दिये –दोनों
रानी
को –
काटे हुए- आधा-आधा फल।
प्रकृति का है –अनूठा
विधान-
आता सुख है दुःख के पश्चात्।
घन घिर आता है-नभ में जब-
पवन उड़ाता उसे आकाश।
अब गोद भरी –ममता
जागी-
होने लगा-वहाँ मंगल-गान।
दुःखों के बाद मिलता सुख जो-
लगता-जग गया हो सुख-भाग।
दो पुत्र अलग-अलग भागों में –
जब पैदा हुए –
राज-भवन में ।
राजा देखकर रूप अजूबा-
अचंभित सोचने लगे मन में।
“यह
कैसी लीला है-प्रभु की-
कैसा इनका अनोखा विधान?
दो टुकड़ों में बंटे हुए अंग हैं-
मगर-शेष है-अभी-भी-प्राण।
मिथ्या लगती है- भविष्यवाणी-
झूठ निकला मुनि का वरदान।
कहे-होगा प्रतापी राजा-
होगा-अत्यंत ही बलवान।
मगर, विकृत स्वरूप लिये है-यह-
चेहरा लगता है-भयावह।
एक-एक अंग उदर-मुख विदरित-
रचे-विधाता स्वरूप डरावन।”
चिंताकुल होकर-राजा उसे –
तुरन्त स्वर्ण-पात्र में रखवाये।
लाल रेशमी कपड़े में ढ़ँक-
मंत्री को फेंकने, कहवाये।
मंत्री ने दिया तभी आदेश –
जा-फेंक आ, इसे निर्जन-स्थान।
कोई नहीं-देख सके इसे-
रखना इस बात का ध्यान।
दासी उठा –अधूरे
पिंडों
को-
चल दी –फेंकने निर्जन वन में।
चिंताकुल देखकर राजा को-
करूणा के भाव उपजे मन में।
किसी स्थान विशेष में रख कर-
लौटी वह राजमहल उदास।
भर रास्ता-सोचती रही वह-
“जीवन
का कैसा- यह मजाक।”
उसी नगर में ‘जरा’ नाम
की –
एक राक्षसी रहा करती थी।
इच्छित वेष-धारण करने का-
वरदान लिये वह फिरती थी।
नजर पड़ी उसे मांस-पिंड पर-
वह भक्षण करने को ली उठा।
तभी, दूसरे को भी देखी-
खाने को था मन ललक उठा।
दोनों पिंड मिलते ही-एक संग-
जुड़कर-बन गया-शिशु था सुंदर।
रोने लगा- गोद में आकर-
ममत्व जाग उठा-उसके अन्दर।
उसी वक्त हुआ- आकाशवाणी-
‘जरा’ है
यह शिशु प्रतिभावान।
बड़ा ही भाग्यशाली है-यह-
होगा-एक दिन यह नृप महान।
पाल सको तो पाल इसे तू-
या फिर सौंप, निःसंतान नृप को।
है शोभा है यह राजमहल की-
देगा-असीम सुख यह नृप को।
देखकर शिशु का रूप मनोरम-
मुख चुमने लगी-लेकर-गोद।
वेष बदलकर, तत्क्षण ही वह-
चल पड़ी- महल मन लिए-प्रमोद।
बोली आकर-रानी से-वह-
“ग्रहण
करें-यह
बाल मनोहर।
यह दीपक है राज महल का-
बना रहेगा-राज धरोहर।”
वह तुरन्त पूछ बैठी- उससे-
“कौन
हो तू देवी अनजान
?
कैसे विश्वास करूँ उस–पर
जो-
शिशु-संबंध कर रही तू बखान।”
“इसी
नगर का वासी हूँ मैं-
वन देवी, ‘जरा’ नाम
मेरा।
नवजात शिशु को देख वन में –
ममत्व उभर आया-उर मेरा।”
रानी की गोद में सौंप शिशु-
हो गई तुरन्त वह अन्तर्ध्यान।
देखकर-रानी रह गई-स्तब्ध-
पर चहक उठा –महल
सूनसान।
अतृप्त-हृदय-ममता से रिक्त जो-
रस-सिक्त कभी न हो पाया।
शिशु पाते ही रानी के मन में –
दीप खुशी का था जल आया।
तेजमय रूप देखकर-शिशु का-
नृप वृहद्रथ भी हुये आनंदित।
खुशियाँ छा गईं थी-महल में-
प्रजागण हो उठे थे प्रमुदित।
तभी आ गये –चंड
कौशिक मुनि-
बोलने लगे नृप से मिल कर।
“ज्ञात
मुझे
पुत्र-जन्म की बातें-
जाऊँगा-इसका नाम गुनकर।
नाम रख लें –
इसका जरासंध-
संधि हुई- जरा के हाथों तन।
हरा सकेगा-इसे न कोई-
सन्निहित है इसमें तीनो-गुण।
सत्गुण से धर्ण-परायण होगा-
रजोगुण से सम्बद्ध कर्म -निष्ठता।
तमोगुण साहस का संबल-
इसको प्राप्त होगी-विशिष्टता।
जिसकी होगी शत्रुता –इससे-
वह तत्क्षण मुँह की खायेगा।
इसकी प्रभुता के समक्ष कभी-
कोई ठहर नहीं-पायेगा।”
यह सुखद कथन-सुनकर-
होने लगा -वहाँ-मंगल-गान।
खुश हो गये-सब मगधवासी-
झूम उठे-थे सुनकर हर्ष-गान।
कहने लगे-मंत्री से सब जन-
“मुँह
मीठा की चाहत शुभ दिन।
मिठाई खा देंगे-दुआयें-
सभी लेंगे- बलायें –गिन-गिन।
छाईं खुशियाँ –आज
महल में-
आया वसंत इतने दिनों बाद।
गुलजार हुआ है –घर-आँगन-
मिटा महल का है अवसाद।”
सहज भाव से कहे मंत्री तब-
“इतनी
जल्दी, यह संभव कैसे ?
इतनी सारी मिठाई- तुरन्त-
इन्तजाम-लगता कठिन-जैसे।
मेरी मंत्रणा है-यह तुम-सब-
ईख से ही मुँह मीठा कर लें।
आज के दिनों-ईख का महत्त्व-
इसे सहर्ष स्वीकार है कर लें।”
मंत्री की बात-प्रजागण मान-
खा लिए-ईख ही समझ मिष्ठान।
थी दसवीं तिथि –शुक्ल
पक्ष-कार्तिक
होने लगा-वह पर्व-जेठान।
आज भी प्रचलन
है-मगध में-
देव ईख से पूजे-जाते।
जरासंध का जन्म-दिन समझकर-
यह त्योहार –मनाये
जाते।
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