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मगध अधिपति जरासंध ---बालेश्वर विद्रोही


तीसरा सर्ग


वृहद्रथ थे पिता जरासंध के

मगध के वे प्रतापी-शासक।

बड़े ही कुशल राज-कार्य में-

ज्ञान था धर्मशास्त्र का व्यापक।

 

काशी-नरेश की कन्या द्वैय-

विवाही गई-थी वृहद्रथ से।

दामपत्य-जीवन सुख से पूरित-

संतुष्ट थे उनके सद्भाव से।

 

दोनों हेतु समान खुशी के-

वृहद्रथ सदा रहे-अभिलाषी।

टूटने नहीं दिये-मनुहार

बने रहे उनके अनुरागी।

 

पर, दुर्भाग्य मानव-जीवन में-

हैं आते-जाते ही रहते।

कभी-पतझड़ तो कभी वसंत भी-

हैं प्रकृति-गोद खेला करते।

 

 

मिलन-विछुड़न सुख-दुःख के यहाँ-

आँख-मिचौनी चलती रहती।

कभी हँसी तो कभी रूदन है-

काल की पहिया घुमा करती।

 

 

 

 

 

वृहद्रथ के जीवन में ऐसा-

दुखद एक समय था आया।

निःसंतान रहे वे अबतक थे-

दारूण दुःख था उन्हें सताया।

 

सहते-सहते असहनीय दुःख-

मन विकल हो उठा था उनका।

वात्सल्य-सुखों से रिक्त हृदय अब-

दग्ध हो रहा था कबसे उनका।

 

 

वैराग्य-भाव उपजे मन में-

अरूचि हो गई राज-पाट से।

मंत्री को सौंप-राज-कार्य को-

विमुक्त हुए- वहाँ काम-काज से।

 

माया-मोह त्यागकर वह थे-

निकल पड़े-तप करने घर से।

रहे-भटकते-शाँति ढ़ूँढ़ते-

जंगल पहुँचे उद्भ्रांत चित्त से।

 

 

चंड कौशिक मुनि से हुई भेंट-

तपस्या में जो थे वहाँ-निमग्न।

जा गिर पड़े-चरण में मुनि के

हो गया था उनका ध्यान भग्न।

 

 

मुनि श्रेष्ठ पूछ बैठे-तत्क्षण-

कौन हो तू-दुःखी क्योंकर ?

दूर करो मन की-विह्वलता-

तू माँग लो इच्छित वर।

 

 

मैं हूँ राजा मगध राज के-

वृहद्रथ एक ऐसा ही-अभाग्य।

संतान-हीन रहा हूँ-अब तक-

है कैसा यह मेरा दुर्भाग्य।

 

मन उचट गया राज-पाट से-

जिसे छोड़ आया मैं वन में।

अरूचि हो गई-राज-सुखों से-

विरक्ति के भाव जागे मन में।

 

 

द्रवित हुये-उनकी दशा देख-

कहे मुनि-ले यह आम्रफल।

जा इसे खिला दे रानी को-

कामना तेरी होगी -सफल।

 

पुत्र होगा-ऐसा बलशाली-

जोड़ न होगा कोई उसका।

नाम करेगा-रौशन तेरा-

यश-गान सर्वत्र होगा उसका।

 

 

 

 

उसे हरा न सकेगा कोई-

चाहे हो कितना क्यों न वीर?

निष्कंटक राज करेगा-महि पर-

होगा वह विकट रण-धीर।

 

निपुण होगा वह युद्ध-कला में-

रहेगा-दया-धर्म अनुपालक।

मानवीयता से ओत-प्रोत-

निर्बलों का बनेगा सहायक।

 

 

मुनिवर प्रदत्त आम्र-फल लेकर

खुशी-खुशी लौटे राजमहल।

खिला दिये दोनों रानी को

काटे हुए- आधा-आधा फल।

 

प्रकृति का है अनूठा विधान-

आता सुख है दुःख के पश्चात्।

घन घिर आता है-नभ में जब-

पवन उड़ाता उसे आकाश।

 

अब गोद भरी ममता जागी-

होने लगा-वहाँ मंगल-गान।

दुःखों के बाद मिलता सुख जो-

लगता-जग गया हो सुख-भाग।

 

 

 

दो पुत्र अलग-अलग भागों में

जब पैदा हुए राज-भवन में ।

राजा देखकर रूप अजूबा-

अचंभित सोचने लगे मन में।

 

 

यह कैसी लीला है-प्रभु की-

कैसा इनका अनोखा विधान?

दो टुकड़ों में बंटे हुए अंग हैं-

मगर-शेष है-अभी-भी-प्राण।

 

 

मिथ्या लगती है- भविष्यवाणी-

झूठ निकला मुनि का वरदान।

कहे-होगा प्रतापी राजा-

होगा-अत्यंत ही बलवान।

 

 

मगर, विकृत स्वरूप लिये है-यह-

चेहरा लगता है-भयावह।

एक-एक अंग उदर-मुख विदरित-

रचे-विधाता स्वरूप डरावन।

 

चिंताकुल होकर-राजा उसे

तुरन्त स्वर्ण-पात्र में रखवाये।

लाल रेशमी कपड़े में ढ़ँक-

मंत्री को फेंकने, कहवाये।

 

 

मंत्री ने दिया तभी आदेश

जा-फेंक आ, इसे निर्जन-स्थान।

कोई नहीं-देख सके इसे-

रखना इस बात का ध्यान।

 

 

दासी उठा अधूरे पिंडों को-

चल दी फेंकने निर्जन वन में।

चिंताकुल देखकर राजा को-

करूणा के भाव उपजे मन में।

 

 

किसी स्थान विशेष में रख कर-

लौटी वह राजमहल उदास।

भर रास्ता-सोचती रही वह-

जीवन का कैसा- यह मजाक।

 

 

उसी नगर में जरा नाम की

एक राक्षसी रहा करती थी।

इच्छित वेष-धारण करने का-

वरदान लिये वह फिरती थी।

 

नजर पड़ी उसे मांस-पिंड पर-

वह भक्षण करने को ली उठा।

तभी, दूसरे को भी देखी-

खाने को था मन ललक उठा।

 

 

दोनों पिंड मिलते ही-एक संग-

जुड़कर-बन गया-शिशु था सुंदर।

रोने लगा- गोद में आकर-

ममत्व जाग उठा-उसके अन्दर।

 

 

उसी वक्त हुआ- आकाशवाणी-

जरा है यह शिशु प्रतिभावान।

बड़ा ही भाग्यशाली है-यह-

होगा-एक दिन यह नृप महान।

 

 

पाल सको तो पाल इसे तू-

या फिर सौंप, निःसंतान नृप को।

है शोभा है यह राजमहल की-

देगा-असीम सुख यह नृप को।

 

देखकर शिशु का रूप मनोरम-

मुख चुमने लगी-लेकर-गोद।

वेष बदलकर, तत्क्षण ही वह-

चल पड़ी- महल मन लिए-प्रमोद।

 

 

बोली आकर-रानी से-वह-

ग्रहण करें-यह बाल मनोहर।

यह दीपक है राज महल का-

बना रहेगा-राज धरोहर।

 

 

 

वह तुरन्त पूछ बैठी- उससे-

कौन हो तू देवी अनजान ?

कैसे विश्वास करूँ उसपर जो-

शिशु-संबंध कर रही तू बखान।

 

 

इसी नगर का वासी हूँ मैं-

वन देवी,जरा नाम मेरा।

नवजात शिशु को देख वन में

ममत्व उभर आया-उर मेरा।

 

 

रानी की गोद में सौंप शिशु-

हो गई तुरन्त वह अन्तर्ध्यान।

देखकर-रानी रह गई-स्तब्ध-

पर चहक उठा महल सूनसान।

 

अतृप्त-हृदय-ममता से रिक्त जो-

रस-सिक्त कभी न हो पाया।

शिशु पाते ही रानी के मन में

दीप खुशी का था जल आया।

 

तेजमय रूप देखकर-शिशु का-

नृप वृहद्रथ भी हुये आनंदित।

खुशियाँ छा गईं थी-महल में-

प्रजागण हो उठे थे प्रमुदित।

 

 

तभी आ गये चंड कौशिक मुनि-

बोलने लगे नृप से मिल कर।

ज्ञात मुझे पुत्र-जन्म की बातें-

जाऊँगा-इसका नाम गुनकर।

 

 

नाम रख लें इसका जरासंध-

संधि हुई- जरा के हाथों तन।

हरा सकेगा-इसे न कोई-

सन्निहित है इसमें तीनो-गुण।

 

 

सत्गुण से धर्ण-परायण होगा-

रजोगुण से सम्बद्ध कर्म -निष्ठता।

तमोगुण साहस का संबल-

इसको प्राप्त होगी-विशिष्टता।

 

 

जिसकी होगी शत्रुता इससे-

वह तत्क्षण मुँह की खायेगा।

इसकी प्रभुता के समक्ष कभी-

कोई ठहर नहीं-पायेगा।

 

यह सुखद कथन-सुनकर-

होने लगा -वहाँ-मंगल-गान।

खुश हो गये-सब मगधवासी-

झूम उठे-थे सुनकर हर्ष-गान।

 

 

कहने लगे-मंत्री से सब जन-

मुँह मीठा की चाहत शुभ दिन।

मिठाई खा देंगे-दुआयें-

सभी लेंगे- बलायें गिन-गिन।

 

 

छाईं खुशियाँ आज महल में-

आया वसंत इतने दिनों बाद।

गुलजार हुआ है घर-आँगन-

मिटा महल का है अवसाद।

 

 

सहज भाव से कहे मंत्री तब-

इतनी जल्दी, यह संभव कैसे ?

इतनी सारी मिठाई- तुरन्त-

इन्तजाम-लगता कठिन-जैसे।

 

 

मेरी मंत्रणा है-यह तुम-सब-

ईख से ही मुँह मीठा कर लें।

आज के दिनों-ईख का महत्त्व-

इसे सहर्ष स्वीकार है कर लें।

 

मंत्री की बात-प्रजागण मान-

खा लिए-ईख ही समझ मिष्ठान।

थी दसवीं तिथि शुक्ल पक्ष-कार्तिक

होने लगा-वह पर्व-जेठान।

 

 

आज भी प्रचलन  है-मगध में-

देव ईख से पूजे-जाते।

जरासंध का जन्म-दिन समझकर-

यह त्योहार मनाये जाते।

 

 

 

 

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