सदियों से है- देश
हमारा-
जन्म-स्थल रहा-वीरों
का ।
बजती रही-रण-भेरी यहाँ
इतिहास रहा-रण-धीरों
का।
आजाद-भगत, विस्मिल,
सुभाष-
आये थे-क्रांतिवीर
बनकर।
देश आजाद कराने हेतु-
कर दिये प्राण थे
न्योछावर।
यहाँ की माटी में लिये
जन्म-
खुदी राम बोस वीर सपूत।
हो गये-शहीद देश-हित
में-
हँस कर फाँसी पर गये
झूल।
महर्षि दयानंद और
परमहंस-
समाज-सुधारक कहलाये।
हिन्दु-संस्कृति के
प्रवर्त्तक बनकर-
स्वामी विवेकानन्द आये।
गुरू वशिष्ठ-वेद-व्यास
जैसे-
मुनियों का है देश
हमारा।
जग में
फैलाये-ज्ञान-ज्योत-
वह किये-जगत को
उजियारा।
गंगा का पावन जल है
निर्मल-
खड़ा हिमालय प्रहरी
बनकर।
तीर्थ-स्थल पवित्र
है-अमरनाथ-
शिव की उपासना है
सुखकर।
‘खजुराहो’ की यही-कला-कृति-
दिखती संस्कृति अति
प्राचीनतम।
‘केणार्क’ की कला-विशेष भी-
चिताकर्षक दिखती
सुन्दरतम।
आगरा का यही ताजमहल-
बना हे-विश्व-प्रसिद्ध
पर्यटन-स्थल।
मुगल काल का लाल किला
है-
‘गंगा सागर’ पावन पुण्य-स्थल।
स्वर्णिम गुरूद्वारा
अमृतसर का-
पावन-स्थल सिक्खों का
रहा है।
रक्त-रंजित “जालियाँ-बाग” यहाँ-
स्मृति-चिन्ह शहादत का
धरा है।
आजादी के लिये –जिन्होंने-
दे दी –हजारों-निज कुर्बानी।
स्मरण मात्र से
जिन्हें आज भी-
आँखों में भर आता पानी।
लाज बचायी थी धरती की-
प्राणों की आहूति देकर
वे।
परवाह न की भरी जवानी –
मुस्कुराकर शूली पर
चढ़े वे।
बिहार की गौरव-गाथा भी-
कुछ कम महत्वपूर्ण
नहीं है।
प्रथम अर्थशास्त्री
कौटिल्य यहाँ-
जिनकी नीति विलक्षण
रही है।
है ‘नालंदा का खंडहर’ गवाह-
अत्यंत प्राचीन
शिक्षालय का।
दर हजार छात्र, शिक्षक
हजार-
थे गर्वित उस
विश्वविद्यालय का।
गौरवशाली था-मगध राज-
था जरासंध जहाँ का
सम्राट।
राजधानी जिसकी-राजगृह-
सेना उसकी थी वहाँ
विराट।
तेरह अछौहिणी सेना-बल-
संगठित था –जरासंध के राज।
बढ़ाया जिसके बल पर
प्रभुत्व-
राज-विस्तार हेतु किया
काज।
राजगृह के वेणुवन स्थल
पर-
दिये थे बुद्ध प्रथम
उपदेश।
महावीर तीर्थंकर भी
यहाँ-
फैलाये थे – शाँति-संदेश।
जीवों की हिंसा वर्जित
करके-
अहिंसा का था पाठ
पढ़ाया।
सहनशील बनकर जग को वह-
मानवता का ज्ञान
सिखाया।
विपुलागिरी पर्वत पर
भी वह-
जलाये ज्ञान-दीप थे
जगमग।
दिये-आलोक जग को उसने-
लहराये जैन-धर्म का
परचम।
जरासंध-अखाड़ा
प्रसिद्ध यहाँ-
सोन-भंडार वहाँ है
स्थित।
मल्ल-युद्ध नित्य हुआ
करता जहाँ-
दूध से जाता था-वह
सिंचित।
दुधिया माटी आज भी
वहाँ-
मिलता-जिसका पुख्ता
प्रमाण।
है रथ के पहियों के
बने चिन्ह-
कृष्ण के आने का
अमिट-निशान।
पावन-स्थल, पावापुरी
यहाँ-
महावीर जहाँ-त्यागे
प्राण।
वे जीवन के आखिर क्षण
में ,
हुआ-यहीं उनका था
निर्वाण।
पर्वत-श्रेणियों से
घिरी जगह-
वनों-उपवनों से है
शोभित।
छटा बिखेर रही
है-सुरभित,
जिसे देख मन होता
प्रमुदित।
इतिहास भुला सकता न
कभी-
यहाँ की गौरवमयी गाथा।
हुये चन्द्रगुप्त ,
प्रियदर्शी अशोक-
थी निहित जरासंध की
आस्था।
उसके हृदय हमेशे बहती-
प्रजा-हित में करूणा
की धार।
जिनको मिला राज में
उनके-
समता का था सभी अधिकार।
प्रजा के दुःख-दर्दों
में जो-
सहायक सदा बनते रहते।
ब्राह्मणों को सौ गौओं
का-
नित्य दान थे-वे दिया
करते।
अतिथि सत्कार निज धर्म
समझ-कर-
करते आये –विप्र को सम्मान।
मद, लोभ, अहं से रहे-
दूर- वह-
प्रजा करते –उन्हें यशो-गान। 26 ।
त्रेता में जन्में
थे-रामचन्द्र-
मर्यादा पुरूषोत्तम
कहलाये।
परन्तु, कहाँ रहे वे
दोष-मुक्त
‘शम्बूक-हत्या’ कलंक लग आये।
द्वापर में योगीराज
कृष्ण-
बने थे-कर्मयोग के
ज्ञाता।
गांधारी से-हुये-शापित-
धर्म के बने
रहे-अधिष्ठाता।
देवों में देव वह
महादेव-
जिनकी है यह कथा
निराली-
भक्त ‘दशानन’ हो या ‘भस्मासुर’
दाता वर के वे
औघड़दानी।
जिन्होंने जग के
कल्याण-हेतु-
हँसकर कर लिया विष का
पान।
जरासंध उनका था अनन्त
भक्त-
पाया जिसने अजब-वरदान।
“अक्षय होगा बाहुबल
तेरा,
सदा रहोगे तुम अपराजित।
जैसा भी रहे
अस्त्र-शस्त्र क्यों न-
तेरी जीत न होगी बाधित।
परन्तु मृत्यु होगी
तुम्हारी भी-
जैसा जन्म हुआ-वैसा-ही।
मरण परम सत्य है
दुनियाँ में –
मनुज जगत में हो जैसा
भी।”
जरासंध शिव का वर
पाप्त कर-
लौटे थे – अपने मगध राज।
वर से प्रतापित होकर
प्रसन्न-
करने लगे थे निष्कंटक
राज।
*