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मगध अधिपति जरासंध ---बालेश्वर विद्रोही


 दूसरा सर्ग

सदियों से है- देश हमारा-

जन्म-स्थल रहा-वीरों का ।

बजती रही-रण-भेरी यहाँ

इतिहास रहा-रण-धीरों का।

 

 

आजाद-भगत, विस्मिल, सुभाष-

आये थे-क्रांतिवीर बनकर।

देश आजाद कराने हेतु-

कर दिये प्राण थे न्योछावर।

 

 

 

यहाँ की माटी में लिये जन्म-

खुदी राम बोस वीर सपूत।

हो गये-शहीद देश-हित में-

हँस कर फाँसी पर गये झूल।

 

महर्षि दयानंद और परमहंस-

समाज-सुधारक कहलाये।

हिन्दु-संस्कृति के प्रवर्त्तक बनकर-

स्वामी विवेकानन्द आये।

 

गुरू वशिष्ठ-वेद-व्यास जैसे-

मुनियों का है देश हमारा।

जग में फैलाये-ज्ञान-ज्योत-

वह किये-जगत को उजियारा।

 

 

गंगा का पावन जल है निर्मल-

खड़ा हिमालय प्रहरी बनकर।

तीर्थ-स्थल पवित्र है-अमरनाथ-

शिव की उपासना है सुखकर।

 

 

खजुराहो की यही-कला-कृति-

दिखती संस्कृति अति प्राचीनतम।

केणार्क की कला-विशेष भी-

चिताकर्षक दिखती सुन्दरतम।

 

 

आगरा का यही ताजमहल-

बना हे-विश्व-प्रसिद्ध पर्यटन-स्थल।

मुगल काल का लाल किला है-

गंगा सागर पावन पुण्य-स्थल।

 

 

स्वर्णिम गुरूद्वारा अमृतसर का-

पावन-स्थल सिक्खों का रहा है।

रक्त-रंजित जालियाँ-बाग यहाँ-

स्मृति-चिन्ह शहादत का धरा है।

 

आजादी के लिये जिन्होंने-

दे दी हजारों-निज कुर्बानी।

स्मरण मात्र से जिन्हें आज भी-

आँखों में भर आता पानी।

 

 

लाज बचायी थी धरती की-

प्राणों की आहूति देकर वे।

परवाह न की भरी जवानी

मुस्कुराकर शूली पर चढ़े वे।

 

 

बिहार की गौरव-गाथा भी-

कुछ कम महत्वपूर्ण नहीं है।

प्रथम अर्थशास्त्री कौटिल्य यहाँ-

जिनकी नीति विलक्षण रही है।

 

 

है नालंदा का खंडहर गवाह-

अत्यंत प्राचीन शिक्षालय का।

दर हजार छात्र, शिक्षक हजार-

थे गर्वित उस विश्वविद्यालय का।

 

 

गौरवशाली था-मगध राज-

था जरासंध जहाँ का सम्राट।

राजधानी जिसकी-राजगृह-

सेना उसकी थी वहाँ विराट।

 

तेरह अछौहिणी सेना-बल-

संगठित था जरासंध के राज।

बढ़ाया जिसके बल पर प्रभुत्व-

राज-विस्तार हेतु किया काज।

 

 

राजगृह के वेणुवन स्थल पर-

दिये थे बुद्ध प्रथम उपदेश।

महावीर तीर्थंकर भी यहाँ-

फैलाये थे शाँति-संदेश।

 

 

जीवों की हिंसा वर्जित करके-

अहिंसा का था पाठ पढ़ाया।

सहनशील बनकर जग को वह-

मानवता का ज्ञान सिखाया।

 

 

विपुलागिरी पर्वत पर भी वह-

जलाये ज्ञान-दीप थे जगमग।

दिये-आलोक जग को उसने-

लहराये जैन-धर्म का परचम।

 

 

जरासंध-अखाड़ा प्रसिद्ध यहाँ-

सोन-भंडार वहाँ है स्थित।

मल्ल-युद्ध नित्य हुआ करता जहाँ-

दूध से जाता था-वह सिंचित।

 

दुधिया माटी आज भी वहाँ-

मिलता-जिसका पुख्ता प्रमाण।

है रथ के पहियों के बने चिन्ह-

कृष्ण के आने का अमिट-निशान।

 

 

 

पावन-स्थल, पावापुरी यहाँ-

महावीर जहाँ-त्यागे प्राण।

वे जीवन के आखिर क्षण में ,

हुआ-यहीं उनका था निर्वाण।

 

पर्वत-श्रेणियों से घिरी जगह-

वनों-उपवनों से है शोभित।

छटा बिखेर रही है-सुरभित,

जिसे देख मन होता प्रमुदित।

 

इतिहास भुला सकता न कभी-

यहाँ की गौरवमयी गाथा।

हुये चन्द्रगुप्त , प्रियदर्शी अशोक-

थी निहित जरासंध की आस्था।

 

उसके हृदय हमेशे बहती-

प्रजा-हित में करूणा की धार।

जिनको मिला राज में उनके-

समता का था सभी अधिकार।

 

प्रजा के दुःख-दर्दों में जो-

सहायक सदा बनते रहते।

ब्राह्मणों को सौ गौओं का-

नित्य दान थे-वे दिया करते।

 

 

 

 

अतिथि सत्कार निज धर्म समझ-कर-

करते आये विप्र को सम्मान।

मद, लोभ, अहं से रहे- दूर- वह-

प्रजा करते उन्हें यशो-गान। 26 ।

 

 

त्रेता में जन्में थे-रामचन्द्र-

मर्यादा पुरूषोत्तम कहलाये।

परन्तु, कहाँ रहे वे दोष-मुक्त

शम्बूक-हत्या कलंक लग आये।

 

 

द्वापर में योगीराज कृष्ण-

बने थे-कर्मयोग के ज्ञाता।

गांधारी से-हुये-शापित-

धर्म के बने रहे-अधिष्ठाता।

 

 

देवों में देव वह महादेव-

जिनकी है यह कथा निराली-

भक्त दशानन हो या भस्मासुर

दाता वर के वे औघड़दानी।

 

जिन्होंने जग के कल्याण-हेतु-

हँसकर कर लिया विष का पान।

जरासंध उनका था अनन्त भक्त-

पाया जिसने अजब-वरदान।

 

 

 

अक्षय होगा बाहुबल तेरा,

सदा रहोगे तुम अपराजित।

जैसा भी रहे अस्त्र-शस्त्र क्यों न-

तेरी जीत न होगी बाधित।

 

परन्तु मृत्यु होगी तुम्हारी भी-

जैसा जन्म हुआ-वैसा-ही।

मरण परम सत्य है दुनियाँ में

मनुज जगत में हो जैसा भी।

 

जरासंध शिव का वर पाप्त कर-

लौटे थे अपने मगध राज।

वर से प्रतापित होकर प्रसन्न-

करने लगे थे निष्कंटक राज।

 

 

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