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मगध अधिपति जरासंध ---बालेश्वर विद्रोही


प्रथम सर्ग

 

 

धरती के इस आंगन में है-

मनु-संतान जन्म लेते रहते।

कुछ मरते कीट-पतंगों से

कुछ रक्त-मोल चुकाते रहते।

 

 

कुछ बाती ऐसी ही-होती-

जो जलती है तूफानों में।

कुछ पथिक राह के ऐसे भी,

जो बढ़ते हैं - बाधाओं में।

 

 

इतिहास बीज बनता रहता-

आने वाले उस कल का।

इन्सान त्याग और तप से ही,

पहनता शीश-मुकुट सुयश का।

 

 

मानव महिमा के गीत विरल ,

गाये जाते जन-जन में है।

सत्य के उनके दीप प्रखर फिर,

जग-मग करते , कण-कण में है।

 

सुरपति भी लघु  बन गये-दान-

कर्ण से कवच और कुंडल लेकर।

हो गया-श्रेण्य एकलव्य वही-

अंगूठा गुरू द्रोण को देकर।

 

 

परहित मानव जब निज जीवन,

वह अर्पित करता भुवन-में है।

शुभ-कर्मों का ध्वज प्रतीक तब-

लहराता नील गगन में है।

 

और पूज्य बनते रहते-जो

छलों का ही लेकर सहारा।

यह बात अजूबा ही लगती-

कहलाते-वे पालनहारा।

 

दबे बीज माटी के नीचे-

धरणी को फोड़ उगा करते।

वीर सपूत शहादत दे भी-

अपनी कीर्ति अमर कर जाते।

 

 

छल से भरा महाभारत-युद्ध-

कहीं से धर्म-युद्ध नहीं लगता

प्रतिशोध, द्वेष से ग्रसित भाव-

है स्वार्थ-जड़ित मानस दिखता।

 

 

हो रहा जग में  अगर, तिरस्कृत -

जब कोय दिग्गज बलिदानी।

कवि-कोविद भुलता नहीं उसे-

लिख जाता मर्म-भरी कहानी।

 

 

 

 

जरासंध मगधपति था महान,

क्षत्रिय कुल का वह स्वाभिमानी।

आतिथ्य-सत्कार धर्म था उसका-

प्रजा वत्सल, था वह अनुरागी।

 

चन्द्र की आभा होती मलिन-

कवि कोविद लख रहा विस्मय से।

उसे कांति-हीन किया किसने?

तथ्य, ढ़ूँढ़ रहा-वह उसमें से।

 

जरासंध-कुल निस्तेज करने को-

चला था कौन यह चाल क्रूर।

क्षत्रियपन विनष्ट करने का

रची किसने साजिश निष्ठूर।

 

कौन था वह किया जिसने था

सेवक बनने पर उन्हें विवश।

मनोबल तोड़कर जिसने था-

वह पूरा किया, निज का हवस।

 

महानन्द की चाल थी-जिसने-

था मूरा से वह ब्याह रचाया।

शुद्रा थी वह माँ चन्द्रगुप्त की-

नाता निभा नहीं वह पाया।

 

 

 

 

चन्द्रगुप्त था आलोक भविष्य का-

प्रतिभाशाली सर्वगुण समपन्न।

चाहत थी-पिता महानन्द की

रह पाये-जीवन पर्यन्त विपन्न।

 

 

महानन्द था अति दुष्ट प्रकृति का-

और चन्द्रगुप्त तीक्ष्ण बुद्धिवाला।

आपस के उनके द्वेष-भाव-

पिता-पुत्र में फूटकर डाला।

 

 

रिपुंजय रहा-जरासंध वंश का-

अंतिम राजा महत बलशाली।

सहयोग दिया-आ चन्द्रगुप्त को-

ले पहुँचा-निज सेना भारी।

 

 

किन्तु, महानन्द ने धूर्तता से-

सब राजाओं को मिला लिया।

पिता-पुत्र की इस लड़ाई में

महानन्द था-उसे हरा दिया।

 

हारे हुए-उन चन्द्रवंशियों को-

महानन्द बन्दी बनाकर रखा।

कुछ भागे-पंचनद छोड़-मगध-

जो थास्वत्व निज बचा कर रखा।

 

यह कथा प्राचीन लगेभले-

पर दंश झेल रहे अबतक कुल।

चुभते रहे-हृदय में उनके

है राज-सुखों का गहन शूल।

 

 

जिसका ही प्रतिफल था वे-सब-

सहते रहे- यातना अब तक।

शोषण, धन का चाहे मन का,

सहन करेगा कोई कब तक?

 

 

छोटी-सी कंकड़ी भी स्थिर जल-

तरंगित कर के ही-दम लेती।

पाँव तले पीस रहे-रेणु भी-

आँखों में पड़-पीड़ा देती।

 

 

उजले कपड़े पर लगे-दाग-

कबतक मनुज छुपा सकता है।

हवा सचेतन उसे खींचकर-

चौराहे पर ला रखता है।

 

 

मनुज धर्म और जाति बाँटकर-

है सुख से कभी न रह सकता।

विद्वेष-भाव से होकर ग्रसित-

अमृत फल है,नहीं चख सकता।

 

 

कलंकित छलनामयी घात की-

गाथा-इतिहास में है वर्णित।

द्वापर में छल का रहा राज-

सदा द्रोण-वृति ही लक्षित।

 

महाभारत की कथा में भी-

मिलते दिखते-बर्बरीक गौण।

जन्म लिए-असुर-कन्या के तन से-

जैसे-एकलव्य था रहा मौन।

 

 

चलता आ रहा युग-युगों से-

आर्य-अनार्य का भेद जग में।

मानवसंतान एक है जब-तब,

भेद-बीज क्यों उगता मन में।

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