धरती के इस आंगन में है-
मनु-संतान जन्म लेते रहते।
कुछ मरते कीट-पतंगों से
कुछ रक्त-मोल चुकाते रहते।
कुछ बाती ऐसी ही-होती-
जो जलती है तूफानों में।
कुछ पथिक राह के ऐसे भी,
जो बढ़ते हैं - बाधाओं में।
इतिहास बीज बनता रहता-
आने वाले उस कल का।
इन्सान त्याग और तप से ही,
पहनता शीश-मुकुट सुयश का।
मानव महिमा के गीत विरल ,
गाये जाते जन-जन में है।
सत्य के उनके दीप प्रखर फिर,
जग-मग करते , कण-कण में है।
सुरपति भी लघु
बन गये-दान-
कर्ण से कवच और कुंडल लेकर।
हो गया-श्रेण्य एकलव्य वही-
अंगूठा गुरू द्रोण को देकर।
परहित मानव जब निज जीवन,
वह अर्पित करता भुवन-में है।
शुभ-कर्मों का ध्वज प्रतीक तब-
लहराता नील गगन में है।
और पूज्य बनते रहते-जो
छलों का ही लेकर सहारा।
यह बात अजूबा ही लगती-
कहलाते-वे पालनहारा।
दबे बीज माटी के नीचे-
धरणी को फोड़ उगा करते।
वीर सपूत शहादत दे भी-
अपनी कीर्ति अमर कर जाते।
छल से भरा महाभारत-युद्ध-
कहीं से धर्म-युद्ध नहीं लगता
प्रतिशोध, द्वेष से ग्रसित भाव-
है स्वार्थ-जड़ित मानस दिखता।
हो रहा जग में
अगर, तिरस्कृत -
जब कोय दिग्गज बलिदानी।
कवि-कोविद भुलता नहीं उसे-
लिख जाता मर्म-भरी कहानी।
जरासंध मगधपति था महान,
क्षत्रिय कुल का वह स्वाभिमानी।
आतिथ्य-सत्कार धर्म था उसका-
प्रजा वत्सल, था वह अनुरागी।
चन्द्र की आभा होती मलिन-
कवि कोविद लख रहा विस्मय से।
उसे कांति-हीन किया किसने?
तथ्य, ढ़ूँढ़ रहा-वह उसमें से।
जरासंध-कुल निस्तेज करने को-
चला था कौन यह चाल क्रूर।
क्षत्रियपन विनष्ट करने का
रची किसने साजिश निष्ठूर।
कौन था वह किया जिसने था
सेवक बनने पर उन्हें विवश।
मनोबल तोड़कर जिसने था-
वह पूरा किया, निज का हवस।
महानन्द की चाल थी-जिसने-
था मूरा से वह ब्याह रचाया।
शुद्रा थी वह माँ चन्द्रगुप्त की-
नाता निभा नहीं वह पाया।
चन्द्रगुप्त था आलोक भविष्य का-
प्रतिभाशाली सर्वगुण समपन्न।
चाहत थी-पिता महानन्द की
रह पाये-जीवन पर्यन्त विपन्न।
महानन्द था अति दुष्ट प्रकृति का-
और चन्द्रगुप्त तीक्ष्ण
बुद्धिवाला।
आपस के उनके द्वेष-भाव-
पिता-पुत्र में फूटकर डाला।
रिपुंजय रहा-जरासंध वंश का-
अंतिम राजा महत बलशाली।
सहयोग दिया-आ चन्द्रगुप्त को-
ले पहुँचा-निज सेना भारी।
किन्तु, महानन्द ने धूर्तता से-
सब राजाओं को मिला लिया।
पिता-पुत्र की इस लड़ाई में –
महानन्द था-उसे हरा दिया।
हारे हुए-उन चन्द्रवंशियों को-
महानन्द बन्दी बनाकर रखा।
कुछ भागे-पंचनद छोड़-मगध-
जो था–स्वत्व निज बचा कर रखा।
यह कथा प्राचीन लगे–भले-
पर दंश झेल रहे –अबतक
कुल।
चुभते रहे-हृदय में उनके –
है राज-सुखों का गहन शूल।
जिसका ही प्रतिफल था –वे-सब-
सहते रहे- यातना अब तक।
शोषण, धन का चाहे मन का,
सहन करेगा कोई कब तक?
छोटी-सी कंकड़ी भी स्थिर जल-
तरंगित कर के ही-दम लेती।
पाँव तले पीस रहे-रेणु भी-
आँखों में पड़-पीड़ा देती।
उजले कपड़े पर लगे-दाग-
कबतक मनुज छुपा सकता है।
हवा सचेतन उसे खींचकर-
चौराहे पर ला रखता है।
मनुज धर्म और जाति बाँटकर-
है सुख से कभी न रह सकता।
विद्वेष-भाव से होकर ग्रसित-
अमृत फल है,नहीं चख सकता।
कलंकित छलनामयी घात की-
गाथा-इतिहास में है वर्णित।
द्वापर में छल का रहा राज-
सदा द्रोण-वृति ही लक्षित।
महाभारत की कथा में भी-
मिलते दिखते-बर्बरीक गौण।
जन्म लिए-असुर-कन्या के तन से-
जैसे-एकलव्य था रहा मौन।
चलता आ रहा –युग-युगों
से-
आर्य-अनार्य का भेद जग में।
मानव–संतान एक है जब-तब,
भेद-बीज क्यों उगता मन में।
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